Monday, August 4, 2014

मैत्रेय परियोजना से बुद्धकालीन रामाभार झील को होगा नुकसान

कुशीनगर में प्रस्तावित मैत्रेय एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसके बनने से विकास की अपार संभावनाएं खुलेंगी। क्षेत्र से अशिक्षा, कुस्वास्थ्य, बेरोजगारी और गरीबी का खात्मा हो जाएगा। पर्यटन के क्षेत्र में भी यह स्थल विश्व के मानचित्र पर मजबूती से उभर कर सामने आएगा किंतु एक सच्चाई यह भी है कि बुद्ध कालीन रामसम्भार झील/रामाभार ताल समेत कई इतिहास भी हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे।

बौद्ध कालीन रामाभार ताल भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद अंतिम संस्कार का साक्षी रहा है। लगभग २५०० वर्ष पूर्व जब बुद्ध ने अपने निर्वाण के लिए कुशीनगर का चुनाव किया था तब सभी चौंक पड़े थे। जब उन्होंने कारणों पर प्रकाश डाला तो सभी सन्न रह गए। वैशाख पूर्णिमा को निर्वाण के बाद तत्कालीन मल्ल राजा ने उनका दाह संस्कार रामाभार ताल के किनारे अपने पवित्रतम कुल देवी के स्थान के निकट कराया था। उस समय झील काफी विशाल थी। नेपाल की तराई से यहां पहुंचने वाली हिरण्यवती नदी विशाल झील के रूप में परिवर्तित हो गई थी और पुन: आगे नदी के रूप में आगे बढ़ती है। प्राचीन काल में झील का नाम रामसम्भार था। आगे चलकर इसे रामाभार ताल कहा जाने लगा जो सैंकड़ों एकड़ क्षेत्र में फैला है। इसी के किनारे बुद्ध के दाह संस्कार स्थल पर निर्मित स्तूप का नाम रामाभार स्तूप पड़ गया। मल्ल राजकुमारों का मुकुट धारण संस्कार ताल के किनारे स्थित कुल देवी के स्थल पर होता था। इसलिए स्तूप को मुकुट बंधन चैत्य भी कहा जाता है। इसी झील के मध्य में १३ दिसंबर २०१३ को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने महत्वाकांक्षी मैत्रेय परियोजना का शिलान्यास किया था। फिलहाल निर्माण में कोई प्रगति तो नहीं दिखती किंतु भविष्य में परियोजना जमीन पर उतर जाने से हिरण्यवती सहित ऐतिहासिक झील का नामोनिशान मिट जाएगा।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सारनाथ मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद् अजय श्रीवास्तव का कहना है कि संरक्षित स्मारक ३०० मीटर की दूरी तक निर्माण बिना अनुमति नहीं हो सकता। रामाभार ताल ऐतिहासिक है। इसकी रक्षा करना सरकार का भी दायित्व है।