BUDDHA
Saturday, November 4, 2017
Wednesday, November 1, 2017
Sunday, January 1, 2017
IndianRail: नए साल से लागू हुई ‘चार्ट तैयार होने के बाद खाली सीटों पर10 फीसदी छूट’ योजना
बलिराम
सिंह, नई दिल्ली
मोदी सरकार ने भारतीय रेलों में सभी प्रकार की गाड़ियों
में प्रथम चार्ट तैयार होने के बाद खाली बर्थ/सीटों पर बेसिक किराए में 10 फीसदी
की छूट (discount) सुविधा की शुरूआत नए साल के पहले दिन से लागू कर दिया।
भारतीय
रेल ने राजधानी (Rajdhani Express) , दुरंतों (Duranto Express) , शताब्दी गाड़ियों (Shatabdi Express) में प्रथम चार्ट तैयार होने के बाद खाली
बर्थों,सीटों पर बेसिक किराए में 10 फीसदी छूट प्रदान करने की अपनी घोषणा को जारी रखते
हुए अन्य सभी रेलों के आरक्षित वर्ग में भी इस छूट के विस्तार का फैसला किया है। यह
सुविधा प्रायोगिक आधार पर एक जनवरी से शुरू होकर अगले छह महीने तक प्रभावी रहेगी।
योजना,
एक नजर-(Buddhadarshan)
1.
प्रथम चार्ट तैयार होने से पहले एक विशेष श्रेणी और रेल के लिए बिक्री
किए गए अंतिम टिकट के मूल किराए पर 10 फीसदी की छूट लागू होगी।
2.आरक्षण
शुल्क और सुपरफास्ट प्रभार पूरी तरह से लगाया जाएगा और प्रयोज्य सेवा कर इत्यादि भी
लागू होगा।
3. टीटीई के द्वारा रेल में (यात्रियों के ना आने के कारण)
खाली हुई बर्थों के आवंटन पर भी फीसदी छूट लागू होगीSaturday, December 10, 2016
बदल रहा है भारत: दलितों के पुरोहित बनें दलित शिवमुनी राम, 100 से अधिक दलितों का करा चुके हैं ब्याह
-बदलती बयार
के साथ सनातन धर्म भी बदले, तभी होगा भारत को एक सूत्र में पिरोने का सपना साकार
बलिराम सिंह,
नई दिल्ली
बदलती
बयार के साथ देश की फिजा भी बदल रही है, सामाजिक परिस्थितियां भी बदल रही है। ऐसे
में हमारे धर्म के ठेकेदारों को भी बदलना होगा और दबी-कुचली कपोल-कल्पित मान्यताओं
को दरकिनार करना होगा, तभी हम भारत को एक सूत्र में पिरोने का सपना साकार कर सकते
हैं, अन्यथा सामाज में विखंडन बढ़ता जाएगा। हमारे साथ हैं दलित समाज के पुरोहित
शिवमुनी राम। खुद दलित Dalit समाज से ताल्लुक रखने वाले शिवमुनी जी (हरिजन) अब तक 100 से
ज्यादा दलितों का विवाह करा चुके हैं।
देश
की आजादी में सर्वोपरि स्थान रखने वाले और सदैव देश की राजनैतिक गतिविधियों में
बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाले उत्तर प्रदेश के बलिया जिला में सामाजिक बदलाव भी तेजी
से हो रहा है। बलिया के बेल्थरारोड क्षेत्र के फरसाटार गांव के निवासी हैं शिवमुनी
राम। यह वही गांव हैं, जिसके बेहद करीब (500 मीटर) उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस
महानिदेशक रिजवान अहमद का पैतृक गांव अवायां है। तो लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का पैतृक गांव इब्राहिम पट्टी है। बेल्थरारोड
क्षेत्र में दलितों की संख्या काफी है। शिवमुनी राम को सनातन धर्म की रूढ़ीवादिता
से बेहद नाराजगी है।
शिवमुनी
कहते हैं कि आखिर हम सनातन धर्म को क्यों अपनाए, जब हमें यहां पर इज्जत ही नहीं
मिलती है। आजादी के 69 साल बाद भी हमारे प्रति लोगों की सोच में बदलाव नहीं हुआ
है।
ऐसे कराते हैं
विवाह-
शिवमुनी
जी मंडप में पंचशील BUddha का झंडा लगाते हैं और यहां पर वर-वधू को पंचशील Panchsheel के नियम बताये
जाते हैं। जिसके तहत जीवों की हत्या न करने की जानकारी भी दी जाती है। यहां पर
डाल-मौर (सनातन धर्म में मंडप में डाल-मौर का इस्तेमाल किया जाता है।) के बजाय वर
पक्ष केवल साड़ी और आभूषण का एक बक्सा रखकर ले जाते हैं। गौरी-गणेश की पूजा नहीं
करते। यहां पर भगवान बुद्ध Buddha को साक्षी मानकर कलश पर पूजा होती है, पंचशील के नियम
पढ़ते हैं।
ये हैं भगवान
बुद्ध Lord Buddha के पंचशील सिद्धांत-
-
प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना
-चोरी
करने या जो दिया नहीं गया है उसको लेने से विरत रहना
-
लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना
-असत्य
बोलने से विरत रहना
-मादक
पदार्थॊं से विरत रहना ।
कोट्स-
‘जिस
समाज में हमें उठने-बैठने law of equality और भोजन का समान अधिकार नहीं है, हम उस समाज में क्यों
रहें? संविधान Indian Constitution हमें समानता का अधिकार देता है, लेकिन व्यावहारिक तौर हमारे समाज
में अभी कुछ नहीं बदला। आज भी हम समाजिक तौर पर वंचित हैं।’ –शिवमुनी राम, दलित
पुरोहित
Tuesday, December 6, 2016
SocialMedia सोशल मीडिया के जरिए ताकी हसन के इलाज के लिए जुटाई गई 8 लाख रुपए राशि
-ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका
से लोगों ने किया सहयोग
-दिल्ली के
फोर्टिस फ्लाईट लेफ्टिनेंट राजन ढल अस्पताल में की गई सर्जरी
बलिराम सिंह, नई
दिल्ली
Social media raises funds for
life-saving surgery of Lucknow man
यदि आप के
पास पैसा नहीं है और आप गंभीर बीमारी से पीड़ित है तो आप सोशल मीडिया के जरिए चंदा
की अपील कर सकते हैं। गंभीर बीमारी से पीड़ित लखनऊ निवासी ताकी हसन को सोशल मीडिया
के जरिए 8 लाख रुपए का सहयोग मिला और उनकी जान बचाई गई।
लखनऊ
निवासी 35 वर्षीय ताकी हसन के लिए सोशल मीडिया के जरिए अमेरिका और आस्ट्रेलिया के
मुस्लिम और सिख समुदायों से रुपए की मदद प्राप्त हुई और इस धनराशि के जरिए
एंटीरियर कॉरनिओफेसियल रिसेक्षन सर्जरी के माध्यम से ट्यूमर हटाने में किया गया। यह
सर्जरी वसंतकुंज स्थित फोर्टिस फ्लाईट लेफ्टिनेंट राजन ढल अस्पताल में अक्टूबर
2016 की गई। मरीज के हेड, नेक एवं ब्रेस्ट ऑन्कोप्लास्टी विभाग के प्रमुख मनदीप एम
मल्होत्रा और न्यूरो सर्जरी विभाग के निदेशक एवं विभागाध्यक्ष डॉ.राणापातिर के
नेतृत्व वाली चिकित्सकों की टीम ने की।
मरीज विदेश
में करता था काम-
ताकी
हसन इलेक्ट्रिशियन के तौर पर काम करने विदेश चला गया, लेकिन एक दुर्घटना के दौरान
उसके सिर में गंभीर चोट आई और उसका जीवन थोड़े समय के लिए ठहर सा गया। इस घटना के
बाद उनकी तबियत खराब होने लगी और चक्कर आने लगे। तत्पश्चात इलाज के लिए ताकी वापस
लखनऊ आ गया, जांच में दाईं आंख के ऊपर माथे पर एक ट्यूमर पाया गया। उनकी पहली
सर्जरी में ट्यूमर को निकाल दिया गया था। लेकिन उसी जगह पर दो बार फिर ट्यूमर बन
गया, जिसके लिए उन्हें बार-बार सर्जरी करानी पड़ी। चौथी सर्जरी के बाद ताकी मानसिक,
शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से लगभग टूट से गए थे।
ट्यूमर का
दायरा-
ट्यूमर
ने ऑर्बिट, नेत्रगोलक (आईबॉल) और चेहरे पर तेजी से फैल रहा था और लगभग उनके ब्रेन
सेल्स तक पहुंच गया।
ऐसे जुटाए गए
पैसे-
आस्ट्रेलिया
में रहने वाले ताकी के एक संबंधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से पैसे की मदद करने की
अपील करने की सलाह दी। इस अपील के बाद ताकी को आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका से काफी
तादाद में लोग मदद के लिए अागे आए। ताकी को आठ लाख रुपए मदद के तौर पर मिले।
सर्जरी के
जरिए निकाला गया ट्यूमर-
सर्जरी
प्रक्रिया के दौरान उनके दाहिने ललाट से 11 सेमी गुणा 7 सेमी आकार का ट्यूमर के
साथ ही क्षतिग्रस्त दाहिने ललाट के साइनस एवं दाएं ऑर्बिट से जुड़े ठोस अल्सर को
निकाल दिया गया। उनकी दाईं आईबॉल में चीरा लगाया गया था और सर्जरी वाली जगह को
ढंकने के लिए कमर से चमड़े को निकाल कर उनके दाई ओर ललाट से लेकर कानों तक की खाली
जगह पर उस स्किन को प्रत्यारोपित किया गया। सर्जरी की प्रक्रिया 16 घंटे लगे।
जटिल थी
सर्जरी-
अस्पताल
के आंकोप्लास्टी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.मनदीप एस मल्होत्रा ने कहा कि मरीज की
स्थिति का विश्लेषण करने पर पाया गया कि उनकी सर्जरी उनके लिए जानलेवा हो सकती है,
क्योंकि यह बेहद जटिल मामला था और घातक ट्यूमर काफी फैल चुका था। पूर्व में की गई
सर्जरी की वजह से जटिलता और बढ़ गई थी, जिसकी वजह से उन्हें अपनी दाईं आंख गवांनी
पड़ी। इस मौके पर ताकी ने कहा कि उन्होंने सभी उम्मीदें खो दी थी और पैसे भी खत्म
हो गए थे लेकिन उदार शुभचिंतकों की ओर से पैसे की मदद से मेरी जान बची।
Friday, November 25, 2016
Buddha जिंदगी हिम्मत हारने का नाम नहीं है दोस्त, बल्कि कोशिश करने का पैगाम है:प्रेमानंद
-फूड
पाइप के जरिए गले से बोलने वाले देश के पहले व्यक्ति हैं प्रेमानंद
बलिराम
सिंह, नई दिल्ली
जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में होती है जहांपनाह। जी हां, यह उसी आनंद
फिल्म का डायलॉग है, जिसे सुनने या देखने के बाद हर दर्शक अपनी सांसें थामे मृत कलाकार
में जिंदगी ढूढ़ने लगता है। जरा सोचिए, अगर रियल लाइफ में भी कुछ ऐसा हो तो क्या हो।
आज भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो मौत से दो-दो हाथ कर जिंदगी को ऐसे जिये जा रहे हैं, जैसे
अभी भी उनमें जिंदगी बाकी है। छोटी-मोटी परेशानियों से घबराकर खुदकुशी कर लेने वाले
लोगों के लिए ऐसे लोग एक सीख हैं, एक प्रेरणा हैं, जो यह बता रहे हैं कि जिंदगी हिम्मत
हारने का नाम नहीं है दोस्त, बल्कि कोशिश करने का पैगाम है, फिर देखना कितनी हसीं है
यह जिंदगी..
गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए प्रेमानंद जी यही संदेश दे रहे हैं। वोकल
कार्ड (गले में आवाज का बाक्स) कैंसर की सर्जरी कराने वाले पूर्व वरिष्ठ अधिकारी
प्रेमानंद देश के पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने सर्जरी के बाद फूड पाइप के जरिए
बोलने की ट्रेनिंग के लिए जापान गए थें और आवाज बॉक्स निकालने के बावजूद फूड फाइप
(खाने की नली) के जरिए गले से बोलने की शुरूआत की। 82 वर्षीय प्रेमानंद आज देश में
हजारों वोकल कार्ड कैंसर मरीजों को सर्जरी के बाद सामान्य जीवन जीने की ट्रेनिंग
दे चुके हैं।
वोकल
कार्ड कैंसर के 90 फीसदी मरीजों में धूम्रपान है मुख्य वजह-
देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान एम्स में वर्ष 1961 में वॉयस क्लिनिक शुरू
करने वाले वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.बीएम एंब्रॉल कहते हैं कि वोकल कार्ड कैंसर (गले में आवाज बॉक्स) की चपेट
में आने वाले लगभग 90 फीसदी मरीज बीमारी से पूर्व धूम्रपान अथवा तंबाकू का सेवन
करते थें। गले के कैंसर (आवाज बॉक्स) से पीड़ित मरीजों के जीवन को बेहतर करने के
लिए डॉ.एब्रॉल ने लैरिंगटॉमी क्लब ऑफ इंडिया की स्थापना की। डॉ.एब्रॉल ने ही वर्ष
1981 में प्रेमानंद के गले की सर्जरी की थी।
1957 से सिगरेट पीते थें प्रेमानंद-
प्रेमानंद
कहते हैं कि वह सीनियर ऑडिट ऑफिसर थे और वर्ष 1957 से ही सिगरेट पीते थें, वर्ष
1979 में उन्हें इस बीमारी का पता चला और वर्ष 1981 में उन्होंने सर्जरी कराई और
1985 में फूड पाइप के जरिए गले से बोलने की ट्रेनिंग (इसोफिगर स्पीच थिरेपी) के लिए जापान गया और 3 महीने की
ट्रेनिंग के बाद भारत आया। उन्होंने बताया कि क्लब में फिलहाल 1200 सदस्य हैं,
जिन्हें हम बेहतर जीवन जीने की ट्रेनिंग देते हैं, साथ ही लोगों से धूम्रपान न
करने की अपील करते हैं।
ये सदस्य रोजाना 10 लोगों से करेंगे अपील-
पिछले दिनों मालवीय
नगर के गीता भवन मंदिर में लैरिंगटॉमी क्लब ऑफ इंडिया की तरफ से आयोजित जागरूकता
कार्यक्रम में देशभर से क्लब के सदस्यों ने शिरकत की। इस मौके पर डॉ.एब्रॉल ने
प्रत्येक सदस्य को रोजाना कम से कम 10 लोगों को धूम्रपान का सेवन न करने के लिए
जागरूक करने की शपथ दिलाई। यदि प्रत्येक सदस्य रोजाना 10 व्यक्ति को धूम्रपान
निषेध के लिए जागरूक करता है तो एक सदस्य एक साल में लगभग 3650 लोगों को जागरूक
करेगा। इसके अलावा कार्यक्रम में बीमारी से पीड़ित मरीजों को अॉपरेशन के बाद फिर से
बोलने की ट्रेनिंग के बारे में भी आवश्यक जानकारी दी गई।
फूड पाइप के जरिए बोलते हैं सदस्य-
वोकल कार्ड कैंसर से पीड़ित व्यक्ति की सर्जरी के दौरान गले से वोकल
कार्ड (वाणी यंत्र) निकाल दिया जाता है, जिसकी वजह से व्यक्ति बोल नहीं पाता है।
ऐसे में सर्जरी के बाद व्यक्ति को फूड पाइप के जरिए बोलने की ट्रेनिंग दी जाती है।
तत्पश्चात प्रेमानंद जापान जाकर बोलने की ट्रेनिंग लेकर आए और अब यह क्लब देश के
विभिन्न हिस्सों में इस बीमारी से पीड़ित लोगों की सर्जरी के बाद बोलने और बेहतर
जीवन जीने के प्रति प्रशिक्षण देते हैं। इस तकनीकी के तहत व्यक्ति को खाने की पाइप
के जरिए आवाज निकालने की ट्रेनिंग दी जाती है।
गुजरात के
राजकोट से आए भूपेंद्र अभानी कहते हैं कि पहले वह सिगरेट बहुत पीते थें। वर्ष 2002
में वह उन्होंने अपने वोकल कार्ड की सर्जरी कराई, इसके बाद उन्हें आवाज वापस आने
में एक साल लग गए, क्योंकि आसपास स्पीच थिरेपी के लिए कोई प्रशिक्षण केंद्र नहीं
था। फिलहाल राजकोट स्थित नातालाल पारिख कैंसर अस्पताल में ट्रेनिंग देते हैं और
कारोबार भी करते हैं।
Tuesday, November 22, 2016
जीवों से प्यार की अनूठी मिसाल- बलजीत ने गाय को बेटी की तरह पाला, मां की तरह सेवा की और मरने पर 41 गांवों के लोगों को भोज कराया, 1.20 लाख रुपए की लागत से बनवाई मूर्ति
बलिराम
सिंह, नई दिल्ली
जीवों से प्रेम की अनूठी मिसाल हैं बलजीत। बलजीत ने 31 साल गाय की सेवा की
और उसकी मृत्यु पर 41 गांवों के लोगों को भोज कराया। साथ ही भोज से पहले गांव में
कलश यात्रा भी निकाली गई और सत्संग हुआ। इसके अलावा बलजीत ने गाय के लिए जयपुर से 1.20
लाख रुपए की लागत से गाय की प्रतिमा बनवाकर उसे गांव के मंदिर में स्थापित किया
गया। रेवाड़ी के धामलावास निवासी बलजीत ने 31 साल पहले वर्ष 1985 में तीन साल की बछिया
को खरीदकर लाया था और उसे बेटी की तरह
पाला। बड़ी हुई तो उसकी सेवा मां की तरह की।
हरियाणा के पीडब्ल्यूडी मंत्री राव नरबीर सिंह भी इस कार्यक्रम में शामिल
हुए और इसे मानवता और इंसानियत की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि इससे सभी को प्रेरणा
लेनी चाहिए। बलजीत ने गाय को बेटी की तरह पाला और बड़ी हुई तो मां की तरह सेवा की। बलजीत
ने बताया कि गाय ने सदैव दूध के माध्यम से मुखिया की तरह हमारे परिवार का लालन पोषण
करती रही। 31 साल की पूरी उम्र होने पर वह दुनिया से विदा हो गईं। वह चार बछिया छोड़कर
गई है। उससे हमारा रिश्ता गाय नहीं, मां की तरह था। इसलिए उसके सम्मान में सोमवार को
41 गांवों के ग्रामीण भंडारे में पहुंचे। इससे पहले गांव में कलश यात्रा निकाली गई
और सत्संग का आयोजन हुआ। एक लाख 20 हजार रुपए की गाय की प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित
की गई, जिसका अनावरण राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री राव नरबीर सिंह ने किया।
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