Saturday, December 10, 2016

बदल रहा है भारत: दलितों के पुरोहित बनें दलित शिवमुनी राम, 100 से अधिक दलितों का करा चुके हैं ब्याह



-बदलती बयार के साथ सनातन धर्म भी बदले, तभी होगा भारत को एक सूत्र में पिरोने का सपना साकार
बलिराम सिंह, नई दिल्ली
बदलती बयार के साथ देश की फिजा भी बदल रही है, सामाजिक परिस्थितियां भी बदल रही है। ऐसे में हमारे धर्म के ठेकेदारों को भी बदलना होगा और दबी-कुचली कपोल-कल्पित मान्यताओं को दरकिनार करना होगा, तभी हम भारत को एक सूत्र में पिरोने का सपना साकार कर सकते हैं, अन्यथा सामाज में विखंडन बढ़ता जाएगा। हमारे साथ हैं दलित समाज के पुरोहित शिवमुनी राम। खुद दलित Dalit समाज से ताल्लुक रखने वाले शिवमुनी जी (हरिजन) अब तक 100 से ज्यादा दलितों का विवाह करा चुके हैं।
देश की आजादी में सर्वोपरि स्थान रखने वाले और सदैव देश की राजनैतिक गतिविधियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाले उत्तर प्रदेश के बलिया जिला में सामाजिक बदलाव भी तेजी से हो रहा है। बलिया के बेल्थरारोड क्षेत्र के फरसाटार गांव के निवासी हैं शिवमुनी राम। यह वही गांव हैं, जिसके बेहद करीब (500 मीटर) उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक रिजवान अहमद का पैतृक गांव अवायां है। तो लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का पैतृक गांव इब्राहिम पट्‌टी है। बेल्थरारोड क्षेत्र में दलितों की संख्या काफी है। शिवमुनी राम को सनातन धर्म की रूढ़ीवादिता से बेहद नाराजगी है।
शिवमुनी कहते हैं कि आखिर हम सनातन धर्म को क्यों अपनाए, जब हमें यहां पर इज्जत ही नहीं मिलती है। आजादी के 69 साल बाद भी हमारे प्रति लोगों की सोच में बदलाव नहीं हुआ है। 
 
ऐसे कराते हैं विवाह-
शिवमुनी जी मंडप में पंचशील BUddha का झंडा लगाते हैं और यहां पर वर-वधू को पंचशील Panchsheel के नियम बताये जाते हैं। जिसके तहत जीवों की हत्या न करने की जानकारी भी दी जाती है। यहां पर डाल-मौर (सनातन धर्म में मंडप में डाल-मौर का इस्तेमाल किया जाता है।) के बजाय वर पक्ष केवल साड़ी और आभूषण का एक बक्सा रखकर ले जाते हैं। गौरी-गणेश की पूजा नहीं करते। यहां पर भगवान बुद्ध Buddha  को साक्षी मानकर कलश पर पूजा होती है, पंचशील के नियम पढ़ते हैं।
ये हैं भगवान बुद्ध Lord Buddha के पंचशील सिद्धांत-
- प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना
-चोरी करने या जो दिया नहीं गया है उसको लेने से विरत रहना
- लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना
-असत्य बोलने से विरत रहना
-मादक पदार्थॊं  से विरत रहना ।
कोट्स-
‘जिस समाज में हमें उठने-बैठने law of equality और भोजन का समान अधिकार नहीं है, हम उस समाज में क्यों रहें? संविधान Indian Constitution हमें समानता का अधिकार देता है, लेकिन व्यावहारिक तौर हमारे समाज में अभी कुछ नहीं बदला। आज भी हम समाजिक तौर पर वंचित हैं।’ –शिवमुनी राम, दलित पुरोहित

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