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Tuesday, October 11, 2016

दो साल पहले अवसाद में थीं दीपिका पादुकोण, उस दौर को याद कर रो पड़ी मस्तानी



-दीपिका ने मानसिक पीड़ितों को अवसाद मुक्त करने का बीड़ा उठाया       
अनिरुद्ध शर्मा, नई दिल्ली
बालीवुड स्टार दीपिका पादुकोण के बारे में यह स्वीकार करना मुश्किल है कि दो साल पहले यह अभिनेत्री अवसाद के दौर से गुजरी थी। सोमवार को अपने अवसाद के अनुभव को साझा करते हुए दीपिका की आंखें छलक उठीं। दीपिका ने कहा, ‘दो साल पहले उनकी मम्मी व पापा और बहन हर महीने की तरह उनसे मिलने बेंगलुरू से मुंबई आए थे। लेकिन जिस सुबह वह जाने को थे तो मैं अपने कमरे में बिस्तर पर इधर-उधर करवटें बदल रही थी, मेरा उठने का मन नहीं था। मेरी मां मेरे पास आईं और पूछा कि सब कुछ ठीक है, मैं कहा, हां। उन्होंने दोबारा पूछा, क्या काम या कोई दूसरी बात तुम्हें परेशान कर रही है? मैंने कहा, नहीं। उन्होंने मुझसे बार-बार पूछा और मैं टूट गई, मेरी आंखों से आंसू बहने लगे।’ यह सब याद करते हुए दीपिका का गला रूंध गया, आंखें भर आईं। आंसु पोंधते हुए उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता था कि ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा था। मेरी मां ने इसे पहली बार पहचाना और कहा कि क्या हम डॉक्टर से मिलें।
दीपिका ने बताया कि ‘उन दिनों पीकू फिल्म की शूटिंग चल रही थी और सार्वजनिक जीवन में जो भी कमिटमेंट थे, उन्हें भी पूरा करना पड़ रहा था। सबके सामने मुस्कुराना भी पड़ता था, एक्टिंग भी चल रही थीं, एडवर्टाइजिंग, प्राडक्ट लांचिंग भी चल रही थी लेकिन भीड़ में भी अजीब लगता था, अचानक खो-सी जाती थी, अकेलापन और खालीपन महसूस होता था। बार-बार रोने का मन करता था। कभी प्लेन के वॉशरूम में, कभी बंद कमरे में ऐसा होता था लेकिन इसका कोई कारण समझ नहीं आता था। फरवरी से लेकर जून-जुलाई तक करीब चार-पांच महीने ऐसा चला।’ मेरे जीवन के इस सबसे खराब दौर में मेरी बहन, मेरे पापा और परिवार व दोस्तों ने सबने भरपूर साथ दिया। ‘मां के कहने पर मनोचिकित्सक और मनोविज्ञानी दोनों से परामर्श किया और आज मैं बिल्कुल ठीक हूं।’
अवसाद से लड़ने के लिए दीपिका ने पिछले साल 10 अक्टूबर को लिव लव लाइफ फाउंडेशन नामक एक एनजीओ बनाया था। दीपिका का कहना है कि यह अवसाद से गुजर रहे और गुजर चुके लोगों की मदद के लिए है। सोमवार को उन्होंने ‘दोबारा पूछो’ अभियान की शुरूआत करते हुए कहा कि आज हम प्रतिस्पर्धा के दौर में जी रहे हैं लेकिन बेहद असंवेदनशील होते जा रहे हैं। इस अभियान का मकसद लोगों को अधिक संवेदनशील बनाना है। उन्होंने कहा कि आज वक्त आ गया है कि हम खुद इसे स्वीकार करें कि हम अवसाद के दौर में हैं या जो आपके बेहद नजदीक है, जिसके बर्ताव के बारे में आप अच्छे से जानते हैं, उसमें कोई बदलाव देखें तो उससे जरूर पूछें, दोबारा पूछें, बार-बार पूछें कि क्या वह ठीक है, सब ठीकठाक है?
दीपिका ने कहा, जिस दिन मानसिक स्वास्थ्य के साथ जुड़ा ‘धब्बा’ अलग हो जाएगा, समझिए आधी जंग जीत जाएंगे, जहां चाह है, वहां राह है।

Monday, October 10, 2016

दीपिका पादुकोण की संस्था’द लिव, लव, लाॅफ फाउंडेशन’ लोगों को बनाएगा मानसिक रोगियों के प्रति संवेदनशील


बलिराम सिंह, नई दिल्ली
फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की संस्था ’द लिव, लव, लाॅफ फाउंडेशन’ लोगों को मानसिक रूप से पीड़ित मरीजों के प्रति संवेदनशील बनाएगा। इस बाबत फाउंडेशन ने ’दोबारा पूछो’ नाम से एक जागरूकता अभियान शुरू किया है। इस अभियान को देश का पहला राष्ट्रीय स्तर का पब्लिक अवेयरनेस कैंपेन बताया जा रहा है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्रत्री अनुप्रिया पटेल की उपस्थिति में इस अभियान को शुरू किया गया।
केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि मानसिक रोगों की बढ़ती समस्याएं ध्यान मांगती हैं। सरकार इन समस्याओं को दूर करने के लिए संसाधन विकसित और वितरित कर रही है। उन्होंने सिविल सोसायटी, कारपोरेशंस और पेशेवरों को समस्याओं के हल और मुहिम को लगातार बनाए रखने के लिए अपना विशेष योगदान देने की अपील की।
दीपिका पादुकोण ने इस मौके पर कहा कि मानसिक रोगों का सामना कर रहे लोगों को प्रेम और सहायता की आवश्यकता होती है। इस संस्था द्वारा शुरू किए गए ’दोबारा पूछो’ अभियान हमें मानसिक रोग से पीड़ित लोगों के प्रति और ज्यादा संवेदनशील बनने के लिए प्रेरित करेगा, ताकि हम पीड़ितों की ओर ध्यान दें और उचित कदम उठाने के लिए उनका मार्गदर्शन करें। उन्होंने कहा कि हमें विश्वास है कि इस अभियान से सामाजिक कलंक को कम करने में बड़ी सफलता मिलेगी। इस मौके पर प्रसून जोशी ने कहा कि अक्सर अभिवादन के रूप में पूछे जाने वाले सवाल से हमें व्यक्ति की समस्याओं के बारे में जानकारी मिलती है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक 10 में से एक भारतीय अवसाद और बेचैनी से प्रभावित है। इस मौके पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष डॉ.केके अग्रवाल भी उपस्थित थें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक 10 फीसदी भारतीय आबादी मानसिक रोगों से ग्रस्त है, उनमें से 80 फीसदी डिप्रैस्सड या बेचैनी से पीड़ित हैं, जबकि शेष 20 फीसदी गंभीर मानसिक समस्या जैसे साईकोसिस, बायोपोरडिस आर्डर, सिजोफ्रेनिया इत्यादि से पीड़ित हैं। आंकड़े के मुताबिक 2013 में भारत में मानसिक बीमारी की वजह से 31 मिलियन लोगों ने स्वस्थ जीवन खो दिया। वर्ष 2025 तक यह अनुमान 38.1 करोड़ तक पहुंच जाएगी। अर्थात 12 सालों में 23 फीसदी की वृद्धि होगी।