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Sunday, January 1, 2017

IndianRail: नए साल से लागू हुई ‘चार्ट तैयार होने के बाद खाली सीटों पर10 फीसदी छूट’ योजना


बलिराम सिंह, नई दिल्ली
मोदी सरकार ने भारतीय रेलों में सभी प्रकार की गाड़ियों में प्रथम चार्ट तैयार होने के बाद खाली बर्थ/सीटों पर बेसिक किराए में 10 फीसदी की छूट (discount) सुविधा की शुरूआत नए साल के पहले दिन से लागू कर दिया।
भारतीय रेल ने राजधानी (Rajdhani Express) , दुरंतों (Duranto Express) , शताब्दी गाड़ियों (Shatabdi Express) में प्रथम चार्ट तैयार होने के बाद खाली बर्थों,सीटों पर बेसिक किराए में 10 फीसदी छूट प्रदान करने की अपनी घोषणा को जारी रखते हुए अन्य सभी रेलों के आरक्षित वर्ग में भी इस छूट के विस्तार का फैसला किया है। यह सुविधा प्रायोगिक आधार पर एक जनवरी से शुरू होकर अगले छह महीने तक प्रभावी रहेगी।
योजना, एक नजर-(Buddhadarshan)
1.      प्रथम चार्ट तैयार होने से पहले एक विशेष श्रेणी और रेल के लिए बिक्री किए गए अंतिम टिकट के मूल किराए पर 10 फीसदी की छूट लागू होगी।
2.आरक्षण शुल्क और सुपरफास्ट प्रभार पूरी तरह से लगाया जाएगा और प्रयोज्य सेवा कर इत्यादि भी लागू होगा।
3. टीटीई के द्वारा रेल में (यात्रियों के ना आने के कारण) खाली हुई बर्थों के आवंटन पर भी फीसदी छूट लागू होगी

Saturday, December 10, 2016

बदल रहा है भारत: दलितों के पुरोहित बनें दलित शिवमुनी राम, 100 से अधिक दलितों का करा चुके हैं ब्याह



-बदलती बयार के साथ सनातन धर्म भी बदले, तभी होगा भारत को एक सूत्र में पिरोने का सपना साकार
बलिराम सिंह, नई दिल्ली
बदलती बयार के साथ देश की फिजा भी बदल रही है, सामाजिक परिस्थितियां भी बदल रही है। ऐसे में हमारे धर्म के ठेकेदारों को भी बदलना होगा और दबी-कुचली कपोल-कल्पित मान्यताओं को दरकिनार करना होगा, तभी हम भारत को एक सूत्र में पिरोने का सपना साकार कर सकते हैं, अन्यथा सामाज में विखंडन बढ़ता जाएगा। हमारे साथ हैं दलित समाज के पुरोहित शिवमुनी राम। खुद दलित Dalit समाज से ताल्लुक रखने वाले शिवमुनी जी (हरिजन) अब तक 100 से ज्यादा दलितों का विवाह करा चुके हैं।
देश की आजादी में सर्वोपरि स्थान रखने वाले और सदैव देश की राजनैतिक गतिविधियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाले उत्तर प्रदेश के बलिया जिला में सामाजिक बदलाव भी तेजी से हो रहा है। बलिया के बेल्थरारोड क्षेत्र के फरसाटार गांव के निवासी हैं शिवमुनी राम। यह वही गांव हैं, जिसके बेहद करीब (500 मीटर) उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक रिजवान अहमद का पैतृक गांव अवायां है। तो लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का पैतृक गांव इब्राहिम पट्‌टी है। बेल्थरारोड क्षेत्र में दलितों की संख्या काफी है। शिवमुनी राम को सनातन धर्म की रूढ़ीवादिता से बेहद नाराजगी है।
शिवमुनी कहते हैं कि आखिर हम सनातन धर्म को क्यों अपनाए, जब हमें यहां पर इज्जत ही नहीं मिलती है। आजादी के 69 साल बाद भी हमारे प्रति लोगों की सोच में बदलाव नहीं हुआ है। 
 
ऐसे कराते हैं विवाह-
शिवमुनी जी मंडप में पंचशील BUddha का झंडा लगाते हैं और यहां पर वर-वधू को पंचशील Panchsheel के नियम बताये जाते हैं। जिसके तहत जीवों की हत्या न करने की जानकारी भी दी जाती है। यहां पर डाल-मौर (सनातन धर्म में मंडप में डाल-मौर का इस्तेमाल किया जाता है।) के बजाय वर पक्ष केवल साड़ी और आभूषण का एक बक्सा रखकर ले जाते हैं। गौरी-गणेश की पूजा नहीं करते। यहां पर भगवान बुद्ध Buddha  को साक्षी मानकर कलश पर पूजा होती है, पंचशील के नियम पढ़ते हैं।
ये हैं भगवान बुद्ध Lord Buddha के पंचशील सिद्धांत-
- प्राणीमात्र की हिंसा से विरत रहना
-चोरी करने या जो दिया नहीं गया है उसको लेने से विरत रहना
- लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना
-असत्य बोलने से विरत रहना
-मादक पदार्थॊं  से विरत रहना ।
कोट्स-
‘जिस समाज में हमें उठने-बैठने law of equality और भोजन का समान अधिकार नहीं है, हम उस समाज में क्यों रहें? संविधान Indian Constitution हमें समानता का अधिकार देता है, लेकिन व्यावहारिक तौर हमारे समाज में अभी कुछ नहीं बदला। आज भी हम समाजिक तौर पर वंचित हैं।’ –शिवमुनी राम, दलित पुरोहित

Friday, November 25, 2016

Buddha जिंदगी हिम्मत हारने का नाम नहीं है दोस्त, बल्कि कोशिश करने का पैगाम है:प्रेमानंद


-फूड पाइप के जरिए गले से बोलने वाले देश के पहले व्यक्ति हैं प्रेमानंद
बलिराम सिंह, नई दिल्ली
जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में होती है जहांपनाह। जी हां, यह उसी आनंद फिल्म का डायलॉग है, जिसे सुनने या देखने के बाद हर दर्शक अपनी सांसें थामे मृत कलाकार में जिंदगी ढूढ़ने लगता है। जरा सोचिए, अगर रियल लाइफ में भी कुछ ऐसा हो तो क्या हो। आज भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो मौत से दो-दो हाथ कर जिंदगी को ऐसे जिये जा रहे हैं, जैसे अभी भी उनमें जिंदगी बाकी है। छोटी-मोटी परेशानियों से घबराकर खुदकुशी कर लेने वाले लोगों के लिए ऐसे लोग एक सीख हैं, एक प्रेरणा हैं, जो यह बता रहे हैं कि जिंदगी हिम्मत हारने का नाम नहीं है दोस्त, बल्कि कोशिश करने का पैगाम है, फिर देखना कितनी हसीं है यह जिंदगी..
गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए प्रेमानंद जी यही संदेश दे रहे हैं। वोकल कार्ड (गले में आवाज का बाक्स) कैंसर की सर्जरी कराने वाले पूर्व वरिष्ठ अधिकारी प्रेमानंद देश के पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने सर्जरी के बाद फूड पाइप के जरिए बोलने की ट्रेनिंग के लिए जापान गए थें और आवाज बॉक्स निकालने के बावजूद फूड फाइप (खाने की नली) के जरिए गले से बोलने की शुरूआत की। 82 वर्षीय प्रेमानंद आज देश में हजारों वोकल कार्ड कैंसर मरीजों को सर्जरी के बाद सामान्य जीवन जीने की ट्रेनिंग दे चुके हैं। 

वोकल कार्ड कैंसर के 90 फीसदी मरीजों में धूम्रपान है मुख्य वजह-
देश के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान एम्स में वर्ष 1961 में वॉयस क्लिनिक शुरू करने वाले वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.बीएम एंब्रॉल कहते हैं कि वोकल कार्ड कैंसर (गले में आवाज बॉक्स) की चपेट में आने वाले लगभग 90 फीसदी मरीज बीमारी से पूर्व धूम्रपान अथवा तंबाकू का सेवन करते थें। गले के कैंसर (आवाज बॉक्स) से पीड़ित मरीजों के जीवन को बेहतर करने के लिए डॉ.एब्रॉल ने लैरिंगटॉमी क्लब ऑफ इंडिया की स्थापना की। डॉ.एब्रॉल ने ही वर्ष 1981 में प्रेमानंद के गले की सर्जरी की थी।
1957 से सिगरेट पीते थें प्रेमानंद-
प्रेमानंद कहते हैं कि वह सीनियर ऑडिट ऑफिसर थे और वर्ष 1957 से ही सिगरेट पीते थें, वर्ष 1979 में उन्हें इस बीमारी का पता चला और वर्ष 1981 में उन्होंने सर्जरी कराई और 1985 में फूड पाइप के जरिए गले से बोलने की ट्रेनिंग (इसोफिगर स्पीच  थिरेपी) के लिए जापान गया और 3 महीने की ट्रेनिंग के बाद भारत आया। उन्होंने बताया कि क्लब में फिलहाल 1200 सदस्य हैं, जिन्हें हम बेहतर जीवन जीने की ट्रेनिंग देते हैं, साथ ही लोगों से धूम्रपान न करने की अपील करते हैं।
ये सदस्य रोजाना 10 लोगों से करेंगे अपील-
पिछले दिनों मालवीय नगर के गीता भवन मंदिर में लैरिंगटॉमी क्लब ऑफ इंडिया की तरफ से आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में देशभर से क्लब के सदस्यों ने शिरकत की। इस मौके पर डॉ.एब्रॉल ने प्रत्येक सदस्य को रोजाना कम से कम 10 लोगों को धूम्रपान का सेवन न करने के लिए जागरूक करने की शपथ दिलाई। यदि प्रत्येक सदस्य रोजाना 10 व्यक्ति को धूम्रपान निषेध के लिए जागरूक करता है तो एक सदस्य एक साल में लगभग 3650 लोगों को जागरूक करेगा। इसके अलावा कार्यक्रम में बीमारी से पीड़ित मरीजों को अॉपरेशन के बाद फिर से बोलने की ट्रेनिंग के बारे में भी आवश्यक जानकारी दी गई।
फूड पाइप के जरिए बोलते हैं सदस्य-
वोकल कार्ड कैंसर से पीड़ित व्यक्ति की सर्जरी के दौरान गले से वोकल कार्ड (वाणी यंत्र) निकाल दिया जाता है, जिसकी वजह से व्यक्ति बोल नहीं पाता है। ऐसे में सर्जरी के बाद व्यक्ति को फूड पाइप के जरिए बोलने की ट्रेनिंग दी जाती है। तत्पश्चात प्रेमानंद जापान जाकर बोलने की ट्रेनिंग लेकर आए और अब यह क्लब देश के विभिन्न हिस्सों में इस बीमारी से पीड़ित लोगों की सर्जरी के बाद बोलने और बेहतर जीवन जीने के प्रति प्रशिक्षण देते हैं। इस तकनीकी के तहत व्यक्ति को खाने की पाइप के जरिए आवाज निकालने की ट्रेनिंग दी जाती है।
गुजरात के राजकोट से आए भूपेंद्र अभानी कहते हैं कि पहले वह सिगरेट बहुत पीते थें। वर्ष 2002 में वह उन्होंने अपने वोकल कार्ड की सर्जरी कराई, इसके बाद उन्हें आवाज वापस आने में एक साल लग गए, क्योंकि आसपास स्पीच थिरेपी के लिए कोई प्रशिक्षण केंद्र नहीं था। फिलहाल राजकोट स्थित नातालाल पारिख कैंसर अस्पताल में ट्रेनिंग देते हैं और कारोबार भी करते हैं।

Tuesday, November 22, 2016

जीवों से प्यार की अनूठी मिसाल- बलजीत ने गाय को बेटी की तरह पाला, मां की तरह सेवा की और मरने पर 41 गांवों के लोगों को भोज कराया, 1.20 लाख रुपए की लागत से बनवाई मूर्ति

बलिराम सिंह, नई दिल्ली
जीवों से प्रेम की अनूठी मिसाल हैं बलजीत। बलजीत ने 31 साल गाय की सेवा की और उसकी मृत्यु पर 41 गांवों के लोगों को भोज कराया। साथ ही भोज से पहले गांव में कलश यात्रा भी निकाली गई और सत्संग हुआ। इसके अलावा बलजीत ने गाय के लिए जयपुर से 1.20 लाख रुपए की लागत से गाय की प्रतिमा बनवाकर उसे गांव के मंदिर में स्थापित किया गया। रेवाड़ी के धामलावास निवासी बलजीत ने 31 साल पहले वर्ष 1985 में तीन साल की बछिया को खरीदकर  लाया था और उसे बेटी की तरह पाला। बड़ी हुई तो उसकी सेवा मां की तरह की।
हरियाणा के पीडब्ल्यूडी मंत्री राव नरबीर सिंह भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए और इसे मानवता और इंसानियत की मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि इससे सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए। बलजीत ने गाय को बेटी की तरह पाला और बड़ी हुई तो मां की तरह सेवा की। बलजीत ने बताया कि गाय ने सदैव दूध के माध्यम से मुखिया की तरह हमारे परिवार का लालन पोषण करती रही। 31 साल की पूरी उम्र होने पर वह दुनिया से विदा हो गईं। वह चार बछिया छोड़कर गई है। उससे हमारा रिश्ता गाय नहीं, मां की तरह था। इसलिए उसके सम्मान में सोमवार को 41 गांवों के ग्रामीण भंडारे में पहुंचे। इससे पहले गांव में कलश यात्रा निकाली गई और सत्संग का आयोजन हुआ। एक लाख 20 हजार रुपए की गाय की प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित की गई, जिसका अनावरण राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री राव नरबीर सिंह ने किया।

Monday, November 14, 2016

Buddha प्राचीन भारत को समझने के लिए एक बार मथुरा संग्रहालय जरूर आएं


बलिराम सिंह, नई दिल्ली
यदि आप इतिहास में रूचि रखते हैं और प्राचीन भारतीय इतिहास के बारे में जानने के इच्छुक हैं तो एक बार मथुरा स्थित राजकीय संग्रहालय जरूर आए। शहर के बीचों बीच स्थित इस संग्रहालय में प्राचीन भारत के पुराने अवशेष और मूर्तियां रखी हैं। यहां ईसवी पूर्व बुद्धकाल से लेकर 10वीं शताब्दी तक की प्रचुर मात्रा में मूर्तियां संरक्षित हैं। यह संग्रहालय बादामी पत्थर से बना है। मथुरा और इसके आस पास की गई खुदाई से मिले अवशेष यहाँ पर रखे गए हैं। यह संग्रहालय कई साहित्यकारों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है जो यहाँ आकर प्राचीन भारत के धर्म को समझते हैं। यहाँ पर रखी मूर्तियाँ भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाती है। यहीं पर सम्राट कनिष्क की सिर विहीन मूर्ति भी संरक्षित है। यह मूर्ति संग्रहालय में प्रवेश द्वार के पास है।




Sunday, September 25, 2016

राज्यारोहण के 20वें साल सम्राट अशोक ने की थी लुंबिनी ग्राम की यात्रा, 87.5 फीसदी कर दिया था लगान माफ

राज्यारोहण के 20वंे साल सम्राट अशोक ने की थी लुंबिनी की यात्रा
बलिराम सिंह, नई दिल्ली             
Emperor Ashoka visited the birth place of Lord Buddha. He also granted Lumbini a tax free status.
एक बार सम्राट अशोक के मन में भगवान बुद्ध के जन्मस्थान को देखने की प्रबल इच्छा हुई। सम्राट अशोक ने अपने गुरू मोगलीपुत्र तिस्स के साथ भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी देखने गए। इतिहासकारों के मुताबिक सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के जन्म से 318 वर्ष बाद और अपने राज्याभिषेक के 20वें साल में लुंबिनी की यात्रा की और यहां पर एक पाषाण स्तंभ लगवाया। सम्राट अशोक ने इस यात्रा के दौरान ही लुंबिनी ग्राम से लगान में 87.5 फीसदी माफ कर िदया, अर्थात कुल उत्पादन का लगान के तौर पर 1/8 वां हिस्सा ही देने का आदेश दिया और शेष कर माफ कर दिया।
अशोक ने भगवान बुद्ध के जन्मस्थल के चारों ओर पत्थर की दीवार बनवाई, और स्मारक के रूप में एक स्तंभ का निर्माण करवाया।
स्तंभ पर लिखा गया ’इध बुधे जाते’-
स्तम्भ पर ’इध बुधे जाते’ अर्थात यहां बुद्ध का जन्म हुआ था, अंकित किया, जो आज भी नेपाल में भगवान बुद्ध के जन्मस्थान को सुनिश्चित कर रहा है। भगवान बुद्ध के प्रति अपनी असीम श्रद्धा के कारण सम्राट अशोक ने पवित्र लुंबिनी अंचल (क्षेत्र) को दान कर दिया। जिस पुष्करणी (जल कुंड) से महामाया (भगवान बुद्ध की मां) ने पानी पीया था, वह आज भी विद्धमान है। पुष्करणी की दूसरी तरफ एक ऊंचा टीला है, जिसपर ईंटों का विशाल स्तंभ देखने को मिलता है। जो सिद्धार्थ के जन्मस्थान होने का संकेत कर रहा है।
लुंबिनी में दो अधुनिक विहार-
लुंबिनी में दो आधुनिक विहार है। पहला थेरवादी बुद्ध विहार, जिसका निर्माण वर्ष 1956 में कुशीनगर के भिक्षु चंद्रमणि महाथेरा द्वारा निर्मित कराया गया और दूसरा तिब्बतियों द्वारा बनाया गया बुद्ध विहार है।
कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया अशोक-
कलिंग युद्ध में लाखों लोगों के मरने के बाद सम्राट अशोक का मन विचलित हो गया और बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद सम्राट अशोक ने लुंबिनी ग्राम का दर्शन करने आया। इसके अलावा सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा।