Friday, August 26, 2016

#Kalahandi केवल सरकारी सिस्टम ही नहीं, बल्कि समाजिक पतन का भी शिकार हुए दाना मांझी

बलिराम सिंह, नई दिल्ली
ओड़िशा के कालाहांडी की दर्द विदारक घटना पर तमाम मीडिया संगठन, बुद्धिजीवी वर्ग केवल सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है, लेकिन जरा सोचिए, क्या ये घटना केवल सरकारी सिस्टम के फेल होने का नतीजा है, अथवा हमारे सामाजिक पतन का परिणाम? इस तरह की घटना पूरी तरह से हमारे सामाजिक तानाबाना का फेल होना बता रहा है।
दाना मांझी अपनी पत्नी को कंधे पर रख कर अस्पताल से घर तक 12 किलोमीटर पैदल चले। उन्हें रास्ते में आते हुए तमाम कोट-पैंट धारी पढ़े हुए, अशिक्षित लोग देख रहे हैं, लेकिन किसी ने दाना मांझी के साथ कंधा शेयर नहीं किया। आखिर हमारा समाज कहां जा रहा है, हम क्यों नहीं इस तरह की समस्याओं पर ध्यान दे रहे हैं।
अरे जनाब, सरकारी सिस्टम को तो देश की राजधानी नई दिल्ली में ही दीमक चाट गया है। राजधानी में आए दिन होने वाली हिंसक घटनाएं, महिलाओं, बच्चों के साथ उत्पीड़न जैसी समस्याएं जगजाहीर है। दिल्ली में स्थित अस्पतालों के बाहर खड़ी एंबुलेंस बहुत कुछ कह जाती हैं।
ऐसे में हम इस समस्या के लिए केवल सिस्टम को दोष देकर अपना दामन पाक-साफ नहीं कर सकते हैं। इस मामले में हम भी पूरी तरह से दोषी हैं। हमारे समाज के लोग दाना मांझी के साथ क्यों नहीं खड़े हुए। उसे आर्थिक सहयोग अथवा उसकी पत्नी को कांधा क्यों नहीं दिया, इसके लिए पूरा समाज दोषी है। अत: हमें पूरे समाज को बदलने की जरूरत है।
घटना पर एक नजर-
ओडिशा के सर्वाधिक पिछड़े जिले कालाहांडी में एक आदिवासी दाना मांझी को अपनी पत्नी के शव को अपने कंधे पर लेकर करीब 12 किलोमीटर तक चलना पड़ा। उसे अस्पताल से शव को घर तक ले जाने के लिए कोई वाहन नहीं मिला। दाना मांझी के साथ उसकी 12 वर्षीय बेटी भी थी। बुधवार सुबह स्थानीय लोगों ने दाना मांझी को अपनी पत्नी अमंग देई के शव को कंधे पर लादकर ले जाते हुये देखा। 42 वर्षीय वर्षीय महिला की मंगलवार रात को भवानीपटना में जिला मुख्यालय अस्पताल में टीबी से मौत हो गई थी।
सरकार से नहीं मिली सुविधा-
स्थानीय नवीन पटनायक सरकार ने फरवरी में ‘महापरायण’ नामक योजना शुरू की। इसके तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक मुफ्त में पहुंचाने की सुविधा दी जाती है, लेकिन दाना मांझी को यह सुविधा नहीं मिली। मांझी ने इस बाबत अस्पताल के अधिकारियों से बहुत मिन्नतें की, बावजूद इसके उन्हें किसी तरह की मदद नहीं मिली। अंतत: उन्होंने अपनी पत्नी के शव को एक कपड़े में लपेटा और उसे कंधे पर लादकर भवानीपटना से करीब 60 किलोमीटर दूर रामपुर ब्लॉक के मेलघारा गांव के लिए पैदल चलना शुरू कर दिया।

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