Thursday, August 11, 2016

Understanding Buddha Nature: The Doctrine of Good Karmas

Baliram Singh, New Delhi
The term ‘Buddha’, ‘Krishna’, ‘Wahe Guru’ or Brahma does not pertains to a person but to the ever-pervading life force, the GOD consciousness.
 According to the Buddhist philosophy, all human beings possess Buddha nature. But just as the clouds cover the sun, the three layers of mind, intellect and ego cover our true loving nature. This true nature is controlled by the cycles of our actions and karma. Each action, good or bad, leads to a memory, and the resultant desires due to memory conditioning instigate us to do those karmas again. Desire controls our five senses. Most of the times, we live in slavery of our sensual pleasures. 
By nature, all human beings are pure like water. It is the stains of bad karma which makes them look dirty.  
Tulku Thondup in his book “The Healing Power of Mind” writes “In the womb of a pregnant woman, although there is a child, we cannot see it, likewise we do not see our own ultimate sphere, which is covered by our emotional afflictions.” 
Your true consciousness is embedded in each and every cell of the body. It is like putting sugar into the milk; once it is dissolved, you can only taste it but cannot physically find it. Buddha Nature can only be achieved by building positive Karmas. Darkness cannot be removed manually but even a ray of light can make a lot of difference. 
Positive Karmas are the key to success. In thoughts, speech, and deeds, one should only perform positive Karma’s.
Love is our universal nature. Spreading the message of love can help one get rid of the past bad Karma’s. There are many examples of Do’s in various teachings guiding us how to perform good actions. One can follow either the four-way test of Rotary, eight limbs of Patanjali Yoga, seven spiritual laws of Deepak Chopra or ten commandments or teachings of Gita, Guru Granth Sahib, Bible and Buddha.
But the simple prescription is not to sleep, unless one has done one good deed on
that day.
(writer- Dr. K K Aggarwal, Padma Shri Awardee and President Heart Care Foundation of India)

Tuesday, August 9, 2016

महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध की अस्थियां



भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों पर आधारित यह कविता 
नई दिल्ली-

बुद्ध की अस्थियां
महापरिनिर्वाण के बाद
आठ भागों में बंटी बुद्ध की अस्थियां
एक हिस्सा मिला मगध सम्राट अजातशत्रु को
बाकी हिस्सों की भी ऐसी ही कहानी होगी
सम्राटों, शिष्यों, भिक्षुओं
और फिर काल को हस्तगत हुआ
राख होने से बचा
बुद्ध का शरीर
कोई एक हिस्सा है बुद्ध का
न ग्रंथों के हाथ आया, न शिष्यों के
न धर्म को वह मिला, न विहारों को, न चैत्यों को
जर्जर हो गई पांडुलिपियों में वह नहीं पाया जाता
वेणुवन से लेकर गृद्धकूट तक
और बामियान से लेकर अमरावती तक
खंडित, अद्र्धखंडित, पूर्ण किसी प्रतिमा में भी नहीं
न जातक में, न अजंता की चित्र-वीथी में,
न पिटक में, न कथा में, न श्रुतियों में...
बुद्ध के उसी अनश्वर
उसी भास्वर
शेष अस्तित्व को खोजती
कोई यात्रा पृथ्वी पर
अब भी है!
अब भी है!!
(साभार- आलोक श्रीवास्तव)

Saturday, July 9, 2016

बुद्ध कहते हैं-धर्म सिद्धांत नहीं, मानव का स्वभाव है




आरके सचान, लखनऊ
बुद्ध कहते हैं, धर्म सिद्धान्त नहीं, मानव स्वभाव है। मानव के भीतर धर्म दिन-रात बह रहा है। ऐसे में सिद्धान्तों से संचालित किसी भी धर्म को धर्म कहलाने का अधिकार नहीं। उसे धर्म मानने की जरूरत ही नहीं है। धर्म के नाम पर किसी प्रकार की मान्यताओं को ओढ़ने या ढोने की जरूरत ही नहीं है। अपने आप में मानव का स्वभाव ही धर्म है।
मानो मत, जानो-
बुद्ध कहते हैं कि अपनी सोच को मानने के बजाय जानने की बनाओ। इस प्रकार बुद्ध वैज्ञानिक बन जाते हैं। अंधविश्वास और पोंगापंथी के स्थान पर बुद्ध मानवता के बीच विज्ञान को स्थापित करते हैं। बुद्ध ने धर्म को विज्ञान से जोड़कर धर्म को अंधभक्ति से ऊपर उठा दिया। बुद्ध ने धर्म को मानने या आस्था तक नहीं रखा, बल्कि धर्म को भी विज्ञान की भांति सतत खोज का विषय बना दिया। बुद्ध कहते हैं, जब तक जानों नहीं, तब तक मानों नहीं। ठीक से जान लो और जब जान लोगे तो फिर मानने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि जानने के बाद तो मान ही लोगे। बुद्ध वैज्ञानिक की तरह से धर्म की बात कहते हैं। इसीलिए बुद्ध नास्तिकों को भी प्रिय हैं।
परंपरा नहीं, मौलिकता पर जोर-
बुद्ध मौलिकता पर जोर देते हैं, पुरानी लीक को पीटने या परम्पराओं को अपनाने पर तनिक भी जोर नहीं है। इसीलिये बुद्ध किसी भी उपदेश या तथ्य को केवल इस कारण से मानने को नहीं कहते कि वह बात वेद या उपनिषद में लिखी है या किसी ऋषी ने उसे मानने को कहा है। बुद्ध यहां तक कहते हैं कि स्वयं उनके/बुद्ध के द्वारा कही गयी बात या उपदेश को भी केवल इसीलिये मत मान लेना कि उसे मैंने कहा है। बुद्ध कहते हैं कि इस प्रकार से परम्परा को मान लेने की प्रवृत्ति अन्धविश्वास, ढोंग और पाखण्ड को जन्म देती है। बुद्ध का कहना है कि जब तक खुद जान नहीं लो किसी बात को मानना नहीं। यह कहकर बुद्ध अपने उपदेशों और विचारों का भी अन्धानुकरण करने से इनकार करते हैं। विज्ञान भी यही कहता है।
दृष्टा बनने पर जोर-
बुद्ध दर्शन में नहीं उलझाते, बल्कि उनका जोर खुद को, खुद का दृष्टा बनने पर है। बुद्ध दार्शनिकता में नहीं उलझाते। बुद्ध कहते हैं कि जिनके अन्दर, अपने अन्दर के प्रकाश को देखने की प्यास है, वही मेरे पास आयें। उनका अभिप्राय उपदेश नहीं ध्यान की ओर है, क्योंकि ध्यान से अन्तरमन की आंखें खुलती हैं। जब व्यक्ति खुद का दृष्टा बनकर खुद को, खुद की आंखों से देखने में सक्षम हो जाता है तो वह सारे दर्शनों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सत्य को देखने में समर्थ हो जाता है। इसलिये बुद्ध बाहर के प्रकाश पर जोर नहीं देते, बल्कि अपने अन्दर के प्रकाश को देखने की बात कहते हैं। अत: खुद को जानना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
मानवता सर्वोपरि-
बुद्ध कहते है, सिद्धांत मनुष्य के लिये हैं। मनुष्य सिद्धांत के लिये नहीं। बुद्ध के लिये मानव और मानवता सर्वोच्च है। इसीलिय बुद्ध तत्कालीन वैदिक वर्णव्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था को भी नकार देते हैं, क्योंकि बुद्ध की दृष्टि में सिद्धान्त नहीं, मानव प्रमुख है। मानव की आजादी उनकी प्राथमिकता है। बुद्ध कहते हैं, वर्णव्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था मानव को गुलाम बनाती है। अत: बुद्ध की दृष्टि में वर्णव्यवस्था, आश्रम-व्यवस्था जैसे मानव निर्मित सिद्धांत मृत शरीर के समान हैं। जिनको त्यागने में ही बुद्धिमता है। यहां तक कि बुद्ध की नजर में शासक का कानून भी उतना मूल्यवान नहीं है, जितना मनुष्य है। यदि कानून सहज मानव जीवन में दखल देता है, तो उस कानून को अविलंब बदला जाना जरूरी है।
स्वप्नवादी नहीं, यथार्थवादी-
बुद्ध ने सपने नहीं दिखाये, हमेशा यथार्थ पर जोर दिया, मानने पर नहीं, जानने पर जोर दिया। ध्यान और बुद्धत्व को प्राप्त होकर भी बुद्ध ने अपनी जड़ें जमीन में ही जमाएं रखी। उन्होंने मानवता के इतिहास में आकाश छुआ, लेकिन काल्पनिक सिद्धान्तों को आधार नहीं बनाया। बुद्ध स्वप्नवादी नहीं बने, बल्कि सदैव यथार्थवादी ही बने रहे। यही वजह है कि बुद्ध का प्रकाश संसार में फैला।
ईश्वर की नहीं, खुद की खोज-
अनकों लोगों ने बुद्ध से ईश्वर को जानने के बारे में पूछा। लोग जानने आते थे कि ईश्वर क्या है और ईश्वर को कैसे पाया जाये? बुद्ध ने हर बार, हर एक को सीधा और सपाट जवाब दियाव्यर्थ की बातें मत पूछो। पहले ध्यान में तो उतरो, पहले अपने अंतस की चेतना को तो समझो। पहले अपनी खोज तो करो। जब खुद को जान जाओगे तो ऐसे व्यर्थ के सवाल नहीं पूछोगे।
अच्छा और बुरा, पाप और पुण्य-
बुद्ध किसी जड़ सिद्धान्त या नियम के अनुसार जीने के बजाय मानव को बोधपूर्वक जीवन जीने की सलाह देते हैं। बुद्ध कहते हैं, जो भी काम करें बोधपूर्वक करें, होशपूर्वक, क्योंकि बोधपूर्वक किया गया कार्य कभी भी बुरा नहीं हो सकता। जितने भी गलत काम या पाप किये जाते हैं, सब बोधहीनता या बेहोशी में किये जाते हैं। इस प्रकार बुद्ध ने अच्छे और बुरे के बीच के भेद को समझाने के लिये बोधपूर्वक एवं बोधहीनता के रूप में समझाया। बुद्ध की दृष्टि में प्रेम, करुणा, मैत्री, होश, जागरूकता से होशपूर्वक बोधपूर्वक किया गया हर कार्य अच्छा, श्रृेष्ठ और पुण्य है। बुद्ध की दृष्टि में क्रोध, मद, बेहोशी, मूर्छा, विवेकहीनता से बोधहीनता पूर्वक किया गया कार्य बुरा, निकृष्ट और पाप है।
कठिन नहीं सहजता-
बुद्ध जीवन की सहजता के पक्ष में हैं, न कि असहज या कठिन या दु:खपूर्ण जीवन जीने के पक्षपाती। बुद्ध कहते हैं, कोई लक्ष्य कठिन है इस कारण वह सही ही है और इसी कारण उसे चुनौती मानकर पूरा किया जाये। यह अहंकार का भाव है। इससे अहंकार का पोषण होता है। इससे मानव जीवन में सहजता, करुणा, मैत्री समाप्त हो जाते हैं। अत: मानव जीवन का आधार सहजता, सरलता, सुगमता है मैत्रीभाव और प्राकृतिक होना चाहिये।
अंधानुकरण नहीं-
बुद्ध कहते हैं, मैंने जो कुछ कहा है हो सकता है, उसमें कुछ सत्य से परे हो! कुछ ऐसा हो जो सहज नहीं हो। मानव जीवन के लिये उपयुक्त नहीं हो और जीवन को सरल एवं सहज बनाने में बाधक हो, तो उसे सिर्फ इसलिये कि मैंने कहा है, मानना बुद्ध अनुयायी होने का सबूत नहीं है। सच्चे बुद्धानुयाई को संदेह करने और स्वयं सत्य जानने का हक है। अत: जो मेरा अंधभक्त है, वह बुद्ध कहलाने का हकदार नहीं।
(लेखक भारतीय वन विभाग के पूर्व अधिकारी हैं)

Tuesday, May 3, 2016

कुशीनगर में बनेगा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

नई दिल्ली
कुशीनगर में जल्द ही अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्‌डे का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा। केंद्रीय पर्यटन मंत्री डॉ.महेश शर्मा ने बताया कि हवाई अड्‌डे के  निर्माण के लिए आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। बता दें कि कुशीनगर बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए काफी महत्वपूर्ण स्थल है। भगवान बुद्ध यहीं पर महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए थें। प्रतिवर्ष यहां पर लाखों की तादाद में विदेशी तीर्थयात्री आते हैं।

Sunday, August 23, 2015

श्रीलंकाई पर्यटकों से गुलजार हुआ सारनाथ




वाराणसी-
विश्व प्रसिद्ध सारनाथ में एक बार फिर श्रीलंकाई पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। लगभग तीन वर्ष पूर्व बोधगया के बोधिमंदिर में हुए सीिरयल बम ब्लास्ट के बाद श्रीलंकाई पर्यटकों की संख्या कम हो गई थी।  लेकिन अब एक बार फिर पर्यटकों की संख्या में वृिद्ध हो रही है। इन दिनों सारनाथ में चारों ओर श्रीलंकाई पर्यटकों को देखा जा सकता है। यहां के होटल, लॉज में सर्वािधक श्रीलंकाई पर्यटकों की संख्या है। इन धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता होने का पर्यटकों पर सकारात्मक असर पड़ा है।

Wednesday, March 4, 2015

मात्र 1360 रुपए में करें वाराणसी से काठमांडू तक बस यात्रा


12 घंटे में पहुंचे सारनाथ से काठमांडु

वाराणसी -
 उप्र से नेपाल की राजधानी काठमांठू को सीधी बस सेवा से जोड़ दिया गया है। बुधवार को नेपाल के लिए चलने वाली मैत्री बस सेवा को उप्र के मुख््यमंत्री अखिलेश यादव ने हरी झंडी दिखायी। प्रतिदिन चलने वाली वाराणसी-काठमांडू बस सेवा का किराया 1360 रूपये है। रखा गया है। करीब 12 घंटे में 604 किलोमीटर की इस यात्रा के दौरान बस आजमगढ़ होते हुए गोरखपुर से सोनौली सीमा से नेपाल में प्रवेश करेगी। बस सेवा के टिकट ऑनलाइन बेचे जा रहे हैं।
      उप्र परिवहन के नोडल अधिकारी पीके बोस ने कहा कि शुरूआती दिन इस बस में जो भी यात्रा करेंगे उन्हें किराए में 30 फीसदी की छूट मिलेगी। इसके साथ ही उन्हें मिठाई का एक डिब्बा और बनारसी सिल्क का परिधान भी उपहार में दिया जाएगा। 31 मार्च तक इस बस में यात्रा करने वालों को 10 फीसदी का डिस्काउंट मिलेगा और एक अप्रैल से पूरा किराया वसूला जाएगा।